शनिवार, नवंबर 12, 2011

तिरंगा लपेटा है ,

एक  इंसान साज़िस में मारा था.................................गाँव आया है ,

इस टूटी हुई चटाई पर कौन लेटा है ,
दर्द जिसका गहरा है ,घाव छोटा है ,
एक इंसान साज़िस में मारा था गाँव आया है ,
जिस्म पर जिसके कफ़न के जगह तिरंगा लपेटा है ,
आज कल एक अजब लड़ाई है मेरे वतन में  ,
एक ओर किसान बाप है ,एक ओर  जवान (सैनिक)बेटा है ,
क्यों हँसा रहे हो हमको हम रो पड़ेंगे ,
कैसे बताएं हमने इन आँखों में क्या-क्या समेटा है ,
एक हमारा पेट है जो भूख से ही भर जाता है ,
एक उनका पेट है जो सारा वतन खा कर भी भूखा है ,

तुम्हारा  -- अनंत

यकीन कैसे हो ,

हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ....................................
हम जी रहे हैं इसका हमें यकीन कैसे हो ,
आसमाँ ने आज तक पुछा नहीं ऐ जमीन कैसे हो ,
जिस इंसान ने खुद कभी गौरैया की पीरा झेली हो ,
वो इंसान फिर बाज सा कमीन कैसे हो ,
लग रहा है यार फिर चुनाव आया है , 
नेता जी पूछ रहे हैं रामदीन कैसे हो ,
जो लोग कम थे उन्हें कमतर बना करके ,
बेहतर लोग सोचते हैं बेहतरीन कैसे हों ,
ये शहर मशीनों का है जहाँ हम रहने आये हैं ,
अब तो रात दिन सोचते हैं कि मशीन कैसे हो ,
बना कर पुर्जा मेरे दिल को किसी मशीन में लगा दिया ,
अब हँसे कैसे ये लैब ये आँखें ग़मगीन  कैसे हो ,

तुम्हारा -- अनंत 

सोमवार, मई 16, 2011

सच्ची मोहब्बत

सच्ची मोहब्बत यूँ ही कहने-सुनने की चीज़ नहीं होती ,
ये वो चीज़ है ''अनंत ''जिसे दिल से समझना पड़ता है ,
गुमनामी है ,बदनामी है ,पागलपन और बदहवासी है ,
बस इन्ही  सब के साथ , दिन-रात रहना पड़ता है ,
एक बार मेरी ग़ज़ल को सीने से लगा कर तो देखो ,
तुम्हे एहसास होगा ,गम से ग़ज़ल गढ़ना पड़ता है ,
जब तुम समझती नहीं हो , मेरी आँखों की बात ,
मुझे मजबूरी में इन कागजों से कहना पड़ता है
 बरसात आती है जब  ,तूफ़ान साथ ले कर के ,
दरख्तों को गिरना पड़ता है ,घरों को ढहना पड़ता है ,
मोहब्बत एक ऐसा बेरहम मक़तल है ,जहाँ पर ,
जिसे जीने की चाहत में  ,हँस कर मरना पड़ता है ,
अरमानों के परिंदों का ,तुमने पर काट दिया  है ,
बेचारे परिंदों को ,बिना पर के  उड़ना पड़ता है ,
हाँ ये सच कहा तुमने की हम कोई शायर नहीं है ,
पर अश्कों को कहीं न कहीं तो  बहना पड़ता है ,

तुम्हारा --अनंत 

तुम्हारी और मेरी मुस्किल

तुम्हारी और मेरी मुस्किल, कोई नई नहीं है यार ,
अक्सर जिस्म जान को, समझ नहीं पाता ,
लाख उलझन को सुलझाने की कोशिश करो ,
जो दिल का उलझा है फिर, सुलझ नहीं पाता ,
यूँ ही खामोश नहीं हो जाता, मैं तेरे सामने , 
ढूंढता हूँ लब्ज़ पर लब्ज़ नहीं पाता ,
मेरे दीद के बादल तेरी याद में दिन रात बरसें  है ,
एक तेरी आँखों का सावन है, जो बरस नहीं पाता ,
हो वस्ल-ए-मौत तो ,खुदा से एक बात पूंछे हम ,
जिसे हम समझते हैं, वो क्यों हमे समझ नहीं पाता ,

तुम्हारा --अनंत  

रविवार, मई 15, 2011

पत्थर का शहर

चलो अँधेरा करो यारों कि अब उजालों से डर लगता है ,
कदम -दो - कदम चलना भी अब सफ़र लगता है ,
न करो रहमत , न हम पर रहम करो तुम ,
तुम्हारा रहम-ओ-करम ,अब हमें कहर लगता है ,
टुकड़े-टुकड़े में बँटी है ,जीते नहीं बनती ,
जिन्दगी का हर एक टुकड़ा कम्बख़त ज़हर लगता है ,
हम तो कांच के थे ,यहाँ आ कर फूट गए ,
ये तेरा शहर हमे ,पत्थर का शहर लगता है ,
जिसकी खबर में हम दुनियाँ कि खबर भूल गए ,
वो ख़बरदार मेरी खबर से बिलकुल बेख़बर लगता है ,
जो एक कदम भी न चला सफ़र में साथ ''अनंत ''
न जाने किसलिए  वो हमे  हमसफ़र लगता है , 

तुम्हारा -- अनंत 

मंगलवार, मई 10, 2011

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,

जब से बिछड़े हैं हम उनसे ,
हम कुछ खोए-खोए हैं ,
कोई अरमान-ए-दिल अब न  जगाए ,
वो बड़ी मुश्किल से सोए हैं ,
एक-एक शेर ज़ख्म है मेरे ,
ग़ज़ल के धागे में बड़ी आहिस्ते से पिरोए हैं ,
उनके हमारे इश्क की दास्ताँ है बस इतनी ,
वो हमारी मोहब्बत पर हँसे हैं  ,हम उनकी मोहब्बत पर रोए हैं ,
क्या कमाया अब तलक जिन्दगी में हमने ,
कुछ याद के मोती हैं जिसे दिल में सजोए हैं  ,
उनके प्यार ने हमको कुली बना दिया ''अनंत'' ,
उनकी यादों के सामान हमने दिन-रात ढोए हैं ,  
तुम्हारा --अनंत 

सोमवार, मई 02, 2011

हम क्यों कर हुए शायर ,

इश्क़ ने किस-किस को, क्या-क्या बना दिया ,
किसी को दरिया बना दिया ,किसी को सहरा बना दिया ,
जो लोग बढ़िया थे ,उनको  बद्त्तर बना दिया ,
जो लोग बद्त्तर थे ,उन्हें बढ़िया बना दिया ,
आँखें ले गया वो ,अपनी आंखों में फँसा कर , 
आँखें  होते हुए भी ,उसने हमे अंधा बना दिया , 
जलते हैं बेसबब ,बेदर्द वीराने में , तन्हाँ ही ,
उसकी आशिकी ने हमे ,बुझता दिया बना दिया ,
हम क्यों कर हुए शायर ,क्या हमसे  पूछते हो ,
बीमार -ए-इश्क़ थे बस  ,इसी बिमारी ने हमे शायर बना दिया ,
दास्ताँ क्या है हमारी '' अनंत '' बस इतना जान लो तुम ,
किसी को हमने मना किया ,किसी ने हमको मना किया ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, अप्रैल 19, 2011

मेरा कितना है ,तेरा कितना ,

इस सुबह में मेरे हिस्से का सवेरा कितना है ,
चराग बुझा कर देख लो, अँधेरा कितना है  ,
तेरे नाम पर तो दावे बहुत लोग करते हैं ,
दिल कहता है आजमा कर देख लूँ, तू  मेरा कितना है,
उस डेरे से उडा था ,इस डेरे पर है ,उस डेरे पर बैठेगा ,
खुदा जाने, इस परिंदे का ,डेरा कितना है ,
भागता हूँ रातो-दिन ,पर अब तक भाग नहीं पाया ,
कोई बतला दे उसकी यादों का ,ये  घेरा कितना है ,
गुनाह हुआ है मुहब्बत में ''अनंत ''तुझसे  भी ,मुझसे भी ,
न जाने इस गुनहा में कुसूर मेरा कितना है ,तेरा कितना ,
 ''तुम्हारा --अनंत '' 

रविवार, अप्रैल 17, 2011

मैं मान नही सकता

मनाना है मुझको तो मुहब्बत से मना लो तुम ,
दिखोगे आँख मुझको तो ,मैं मान नही सकता ,
तलवारें सर  काटती होंगी ,मैं मान सकता हूँ ,
तलवारें  इरादा -ओ -हौसला काटें  ,मैं मान नही सकता ,
दिल ने कह दिया तो कह दिया ,अब क्या कहना,क्या सुनना ,
दिल के अलवा किसी का कहा, मैं मान नही सकता ,
नासेह न जाने कितना कुछ समझाया था मुझको ,
पर मैने भी कह दिया, खुद को अजमाए बिना ,मैं मान नही सकता,
लागे हों लाख पहरे तो  लगे रहने दो अब  ''अनन्त'' 
उसके कूचे जाए बिना, मैं मान नहीं सकता ,
तुम्हारी आँखें हाँ कहती हैं,तुम्हारी जुबाँ न  कहती  हैं ,
सच्ची आँखों के आगे ,झूठी जुबाँ कि बात मैं,मान नही सकता,
तुम्हारा  --अनंत 

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

वो शहर इलाहाबाद न होता !

मैं जीस्त के  सारे गम भूल जाता ,
गर वो मुझे अब तक याद  न होता ,
 मुस्कुरा ले  दिल ! ये कहता अपने दिल से मैं ,
गर दिल बेचारा ये, मेरा नाशाद न होता ,
ये दर्द की दौलत मुझे कैसी मिलती यार, 
गर मैं उसकी चाहत में, इस कदर बर्बाद न होता ,
बड़ा तल्ख़ था वो वक़्त, जिसने हमें शायर बनाया हैं, 
हम कायर हो गए होते, गर इरादा फौलाद न होता ,
बड़ी तरीके से मारा हैं, उसने हमें प्यार में अपने,
कौन मरता हंस करके ,गर वो यूँ हंसी जल्लाद न होता ,
कई भटके हुए आशिक बसे हैं,  इस अदब के जंगल में,
गर उन्हें मंजिल मिल गयी होती, ये जंगल आबाद न होता ,
एक शहर में दो संगम हो नहीं सकते ,
हमारा मिलन हो गया होता, गर वो शहर इलाहाबाद न होता ,
तुम्हारा --अनंत                                                         
                                                       

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

हवाओं में बुत

मंजिलें एक हैं ,एक रास्ते  हैं ,
वो हमारे वास्ते हैं ,हम उनके वास्ते हैं ,
इन आँखों में फ़कत उनकी तश्वीर बसती है ,
हम हवाओं में भी  उनके  ही बुत तरासते हैं, 
वो खामोस हैं ,दुनिया को ये लग रहा है ,
दुनिया  को क्या पता ,वो हमे आँखों से पुकारते है ,
आँखों की चोरी तो इश्क में लाजमी  है ''अनंत ''
हम आँखें चुरा -चुरा ,कर एक दूजे को निहारते है ,
तुम्हारा -- अनंत


रविवार, मार्च 13, 2011

जिश्म पे घाव

तुम्हारा मुरझाया हुआ चेहरा ,तुम्हारी कहानी है ,
तुम्हारी आँखों में आँसूं नहीं, गंगा का पानी है ,
अपने जिश्म  पे घाव बड़े चाव से ढो रहे हो तुम ,
तुम कुछ कहते क्यों नहीं , मुझे बड़ी हैरानी है ,
गद्दार दरख्तों के साये में  बैठना गद्दारी है ,
बेमन हवाओं में सांस लेना ,बेमानी है ,
ये वक़्त नमाज़  का वक़्त है शायद ,
तभी तो सड़कें इतनी वीरानी है ,
जो बात अब तक अनकही थी अनसुनी थी ,
तुम सुनो न सुनों ,हमें तो सुनानी है ,
तुम्हारा --अनंत 

शनिवार, मार्च 12, 2011

सुलझा रहा हूँ

उसके उलझे बालों पर लिखी थी एक नज़्म ,
वो अब तक उलझी है ,सुलझा रहा हूँ ,
एक हवा सी आई ,याद जग गयी उसकी ,
मैं थपकियाँ दे -दे कर, उसे सुला रहा हूँ ,
कह गयी थी जाते वक़्त ,आवाज़ मत देना ,
वो चली गयी है ,और मैं उसे बुला रहा हूँ ,
एक उदास ग़ज़ल की आँखों में ,नमी के मिसरे ,
बिखरे हुए हैं ,और मैं उसे सजा रहा हूँ ,
जिस जगह बिछड़े थे हम ,ये उसी जगह पड़ा था ,
मैं टूटा हुआ दिल, झुनझुने सा बजा रहा हूँ ,
कुछ जलता हुआ सा है मेरे सीने में ,न जाने क्या है ?
मैं रो -रो कर , उसे अश्कों से बुझा रहा हूँ , 
जिंदगी आई ,ज़मीं पर बैठ गयी हंस कर ,
मैंने  कहा ,अरे रुको मैं अपनी जाँ बिछा रहा हूँ ,
बहुत खोल दिया मैंने खुद को ,तुम्हारे सामने ''अनंत''
न जाने तुम कौन हो मेरे ,जो मैं  राज -ए- दिल बता रहा हूँ ,
''तुम्हारा --अनंत '' 







कल रात से

एक धुवाँ सा बैठा हुआ है मेरे भीतर, कल रात से ,
उठने का मन ही नहीं करता, मैं सोया हुआ हूँ, कल रात से , 
वो मिल गया था ,कल शाम चौराहे  पर , कुछ इस तरह,
कि उससे मिल कर, मैं खोया हुआ हूँ, कल रात से ,
वो जो चराग है ,जल रहा है ,कुछ वक़्त में बुझ जायेगा ,
क्या करे बेचारा अकेले ही  लड़ रहा है ,कल रात से ,
वो शायद  मोम था जिसे मैंने  गरमजोशी से छू दिया ,
लगातार वो मोम का पुतला पिघल रहा है, कल रात से ,
चाँद आवारा हो गया है ,घर पर रुकता ही नहीं ,
बस यहाँ -वहाँ ,जहाँ -तहाँ ,टहल रहा है, कल रात से ,
बरदास्त होता नहीं लगता है जाँ निकल जाएगी ,
एक अदना सा दर्द था जो बढ़ रहा है, कल रात से ,
माँ ने पायल बेंच कर एक किताब मुझे दिलाई है ,
आँखों में आंसू लिए मैं उसे पढ़ रहा हूँ ,कल रात से ,
तुम्हारा --अनंत

















गुरुवार, मार्च 10, 2011

जिन्दगी घाँस नोचती है

 किसी टीले पर अकेले बैठ कर सोंचती  है ,
जिन्दगी जब मायूस होती है तो घाँस नोचती है ,
पड़ती है  जब डांट सास की ससुराल में ,
माँ को याद करके बेटियाँ आंसू पोछती है ,
अँधेरी रात जब अँधेरे से परेशान हो जाती है ,
खुद घर से निकल कर जुगनूवों की टोलियाँ खोजती है,
तितलियाँ नादान हैं  ,मासूम हैं , पछ्ताएँगी ,
ये जो फरेबी फूलों का फरेबी रस चूसती हैं ,
बच्चें चले गए हैं परदेश ,क्या करें, अकेलें हैं ,
दो बूढी आँखें हैं  घर पर ,जो एक दूजे को देखती है ,
''अनंत'' उन बुजुर्गों की आँखों से फिर आंसू नहीं बहते ,
जिनकी  बहती आँखों को नन्हीं हथेलियाँ पोंछती है,
 तुम्हारा- -अनंत   
  

बुधवार, मार्च 09, 2011

चुप रहना पड़ता है

चुप रहो यहाँ पर ,चुप ही  रहना पड़ता है ,
जो न कहना चाहो वो भी हंस -हंस  कहना  पड़ता है ,
मुर्दों के शहर  में सब मुर्दे जिन्दा बन कर रहते है ,
 मुर्दों के बिच में रहना है ,तो मुर्दा बन कर रहना पड़ता है ,
हम  तो एक परिंदा हैं, हवा के संग उड़ जायेंगें ,
जिसे  परिंदा बनाना है ,हम जैसा उड़ना पड़ता है ,
बात कहने को तो हर कोई अक्सर  ही कह देता है ,
पर बात को, बात की तरह कहने को, हिम्मत करना पड़ता है ,
कौन उन्हें समझाए, जो एक बार गिरे, और टूट गए ,
गर सिर ऊंचा कर के चलना है ,तो गिर -गिर कर उठाना पड़ता है ,
 तुम्हारा --अनंत  

मंगलवार, मार्च 08, 2011

आदमी


वो जो आदमी नहीं है ,आदमी बने फिरते है ,
ये जो आदमी हैं, इन्हें लगता ही नहीं ,ये आदमी हैं ,
आज आदमी,आदमी से मतलब रखता नहीं ,
इन  आदमी जैसों को कैसे कहें ,कि ये आदमी है ,
आज इस  कदर बोझ है आदमी के कन्धों पर ,
कि आदमी ,आदमी हो कर भी, लगता नहीं कि आदमी है ,
एक आदमी को कल देखा था नाली से चावल बिनते हुए ,
मेरे भीतर के आदमी ने मुझसे पुछा, कि क्या ये आदमी है ,
एक पागाल के जख्म को एक कुत्ते ने चाट-चाट  कर ठीक कर दिया,
लोगों ने कहा ,क्या कुत्ता है ,मैंने कहा, क्या आदमी है 
हर एक आदमी एक अजब गफलत में है आज  ,
वो आदमी नहीं है ,फिर भी उसे लगता है, कि वो आदमी है ,
आदमियों कि भीड़ में, आदमी खोजता हूँ मैं ,
ये आदमी मुझे देख कर कहते है ,क्या अजीब आदमी है ,
जब कभी देखता हूँ ,किसी आदमी को, तो देखता हूँ, 
इस आदमी के भीतर भी क्या कोई आदमी है ,
खुद के दर्द पर तो हर कोई रोता है ''अनंत'' ,
जो गैंरों के दर्द पर रो पड़े बस वही आदमी है ,
तुम्हारा --अनंत


समंदर का इन्तिजाम हो सकता है

करो हिम्मत तो हर काम आसान हो सकता है ,
इतिहास के पन्नों पर तुम्हारा भी नाम हो सकता है ,
आज जिस नाम पर इतना इतरा रहे हो तुम ,
कल  तुम्हारा वो नाम  भी गुमनाम हो सकता है,
शाम उसकी आँखें पढ़ी ,तो पता चला ,आँखें डाकिया होती है ,
 वरना क्या खबर थी ,आँखों में भी ,प्यार का पैगाम हो सकता है , 
हंसी  आये तो जंगलों की तरफ भाग जाया करो ,
यूं शहर में हंसोगे तो यहाँ रहना हराम हो सकता है ,
ये मंदिर -मश्जिद भी तो  किसी मैखाने से कम नहीं ,
यहाँ फिरकापरस्ती का जाम पी कर, दिमाग जाम हो सकता है,
एक पागल मिला था चौराहे पर पर रोता हुआ ,
बोला मेरा नाम रहीम हो सकता है ,या फिर राम हो सकता है ,
कुछ नामुमकिन नहीं है अनंत बस अरमानों में जोर हो ,
चाहत बलंद हो तो सहरा में समंदर का इन्तिजाम हो सकता है ,
तुम्हारा-- अनंत  

शुक्रवार, मार्च 04, 2011

माँ....

वो मुझे चूमती थी ,गले लगाती थी ,प्यार देती थी ,
जब मैं रोता था, थाली में चंदा उतार देती थी ,
उसके दामन के छोर पर  बंधी रहती थी एक गट्ठी ,
उस गट्ठी को खोल कर वो मुझे दुलार देती थी ,
कोई काम  नहीं बिगड़ता था मेरा यारों ,
जब मैं घर से निकलता था ,वो मुझे  निहार देती थी ,
उसने जब भी माँगा खुदा से मेरी जीत मांगी ,
वो अपनी दुवाओं में मुझे सारा  संसार देती थी ,
मेरी माँ ही छिप कर बैठी रहती थी मेरे भीतर ,
जो मुझे चोट लगने पर अपने नाम पुकार  देती थी ,
बस एक वो ही थी पूरे जहाँ में ''अनंत''
जो मेरे ग़मों के बदले में  ,मुझ पर अपनी खुशियाँ वार देती थी ,
तुम्हारा--अनंत   

मुट्ठी में झाग

एक प्यासा कुंआं है ,एक अँधा चराग ,
पानी को छूने से, लगती है आग 
हांथों में लेकर समंदर चला था ,
अब तो मुट्ठी में केवल बचा है झाग ,
छोड़ कर जंगलों को सब चलते बने ,
खादी पहन कर दिल्ली में फिरते हैं नाग ,
आग बस्ती में तेरी है लग गयी ,
बुझाना है बुझा ,भागना है भाग ,
तू  इन्सां है ,तो इन्सां बन कर जी ,
क्यों इंसानियत के दमन पर बनता है  दाग ,
एक बुड्ढा सा दर्द थक कर सोया हुआ है ,
जरा धीरे से बोलो ,वरना जायेगा जाग ,
जुगनूवों को जोड़ कर एक कर दिया ,
अँधेरे में मिल कर सब हो गए चराग ,
तुम्हारा --अनंत  

शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

बड़ा मुश्किल है...

जिस्म  जाँ से नाराज हो जाए ,बड़ा मुश्किल है , 
धड़कन कुछ कहे ,दिल सुन न पाए ,बड़ा मुश्किल है ,
सांस लिए बगैर जिया जा सकता, तो जी लेता ,
जीता भी रहे कोई ,और सांस न आए ,बड़ा मुश्किल है ,
बच्चे खिलौनों को फ़खत खिलौना नहीं समझते , 
कोई तोड़ दे उन्हें , वो आंसू न बहाएं ,बड़ा मुश्किल है ,
समझदार लोग जब नसमझी करें, तो हम क्या करें ,
समझदारों को भी समझाया जाए ,बड़ा मुश्किल है ,
वो भूल गए हमे,बड़े माहिर निकले , 
हम उन्हें भूल जाएं, बड़ा मुश्किल है ,
''तुम्हारा -- अनंत ''

शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

सब दिखाई दे रहा है ,

कुछ बोलिए या  न बोलिए ,सब सुनाई दे रहा है ,
क्या छिपा रहें हैं  बेवजह ,सब दिखाई दे रहा है ,
आप खुद की अदालत में अब कैसे बच पाएंगे  ,
आपका दिल आपके खिलाफ गवाही दे रहा है ,
जिस उम्र में कोई टॉफी के लिए ज़िद्द करता है ,
उसी उम्र में कोई माँ -बाप को  कमाई दे रहा है ,
आज २६ जनवरी है ,चलो टी0 वी० खोलो ,
लाल किले की छत  पर चढ़ कर कोई सफाई दे रहा है ,
हमने जिसे वोट दे कर, अपनी किश्मत सौंपी  थी,
 वो हमे घोटाले ,भूंख ,तड़प,और महंगाई दे रहा है , 
तुम्हारा-- अनंत  

बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

उलझा हुआ सा है कुछ ...

उलझा हुआ सा है कुछ ,शायद ये मेरा दिल है ,
फोड़ दे जो सिर लहेरों का, बस वही शाहिल है ,
चाँद के रुखसार पर दाग है ,लोग कहते  है ,
हमे तो लगता है ,वो कोई प्यारा सा तिल है ,
 हम उनकी आँखों में,  डुबकी लगाये बैठे है ,
बेहतरीन है ये जगह ,ताउम्र रहने  के काबिल है,
इस महफ़िल में सब हलके- फुल्के नज़र आते हैं .
एक हम ही शायद जो इस कदर  बोझिल  हैं ,
हमे फिर से क़त्ल होने की हसरत है अनंत ,
क्या करें कम्बख़त बड़ा खुबसूरत कातिल है ,
"तुम्हारा --अनंत ''


 


रविवार, फ़रवरी 20, 2011

ये अजीब कैदखाना है....



ये अज़ब अफरातफरी ,रस्साकसी का माहौल है,
कल तक जहाँ पर दुकानें थीं ,आज वहाँ पर मॉल है ,
पसीना छूटता है ,जब टूटता है, कोई सपना ,
ये आँसू थमते ही नहीं ,आँखों में अज़ब  ढाल है ,
मेरे नंगे तन पर, जब उसने रेशमी टुकड़ा डाला ,
 मुहं से यूँ ही निकला ,ये मेरी ग़ुरबत का माखौल है ,
बैठ कर तन्हाई में ,तन्हाई ,तन्हा ही रो लेती है ,
दिल के दर्द पर ,ये आवाज़ की जली हुई ख़ाल है ,
इस आश्मां में करफू लगा है ,क्या करें ,
छिन गयी है उड़ान ,परिंदे सभी बेहाल हैं ,
हैं फसे जिसमे सभी, सब कैद है,
उस अज़ब कैदखाने का नाम रोटी दाल है,
तुम्हारा --अनंत





शुक्रवार, फ़रवरी 18, 2011

मिली आँख जो उससे......

मिली आँख जो उससे ,वो पसीना -पसीना हो गयी ,
दबे पाँव ज़ीने  से उतरी, और उतर कर खो गयी ,
कल मैंने रात को रात भर जगाए रखा था ,
हुई सुबह तो दिन का दामन बिछा कर सो गयी ,
यूं तो पड़ा था मैं किसी नदि में सूखा -सूखा ,
तेरी याद की बारिश हुई और मुझे भिगो गयी ,
उस खंडहर के पीछे मैं अब कभी नहीं जाता ,
जहाँ तुम तन्हाई की सब्ज़ फसल बो गयी ,
अनंत मैं तो रुक गया होता ,थक कर बुझ गया होता ,
एक उसके आने की उम्मीद में जिंदगी चराग़ हो गयी ,
तुम्हारा --अनंत 


अनंत क्या कहें तुमसे...

अनंत क्या कहें तुमसे,बस दर्द कहता है,
ये खता तुम्हारी है, जो तुम उसे ग़ज़ल कहते  हो,
 तुम  दूर हो हमसे ,ये तुम्हारा कहना  है ,
हम तो  ये कहते  हैं , तुम हमारे दिल में रहते हो, 
पत्थर की तरह हम पड़े हैं ,न जाने कब से ,
ये तो तुम ही हो, जो हर वक़्त दरिया सा बहते हो,
हमारी हँसी को देख कर, दुनिया ग़फलत में है ,
लोग हमसे कहते  हैं ,तुम तो रोते वक़्त भी हँसते हो  ,
उस दिन वो कुछ नहीं बोला , जब हमने उससे  पूछा था ,
ए  ढलते हुए सूरज, तुम कैसे ढलते  हो,
जब दर्द होता है ,तब आंसू निकलता  है ,
तुम बेदर्द हो ,बेवजह  क्यों आँखे मलते हो  
तुम्हारा --अनंत